हज़ारों तारे उसे आँख भर के देखते हैं
तमाम झरने जबल से उतर के देखते हैं

हमारे होंठ लरज़ते हैं सामने उनके
सो क्यूँ न नज़रों से ही बात कर के देखते हैं

अबस है सामने उसके सभी की आराइश
अजब हैं आप कि फिर भी सँवर के देखते हैं

हैं उसकी रत्ब सी आँखें इनायत-ए-यज़्दाँ
ये झील क्यों न कभी पार कर के देखते हैं

है उसका चेहरा अगर फूल की तरह नाज़ुक
तो क्यों न तितलियों जैसा ठहर के देखते हैं

ख़बर है बे-रुख़ी की उसकी हम को भी ‘अबतर’
चलो ये राह-ए-ख़लिश से गुज़र के देखते हैं

- अच्युतम यादव 'अबतर'