एक वीरान मंज़िल
तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की
क्यों नहीं फिर देखते हो
एक मुद्दत से मेरे दिल पे जमी धूल
इक भी नक्श-ए-पा नहीं जिसपे किसी के
रास्ता इक भी नहीं आता जहाँ तक
कोई ख़्वाहिश अब नहीं करता है मेरी
बरसों पहले आया होगा जो कोई भी
जब कभी वो लौटा होगा
ले गया होगा मेरे दिल के मसाइल
पर मसाइल अब भी हैं मौजूद मेरे
सबसे अव्वल मसअला है
तुम मुझे मंज़िल समझते हो किसी की
पूछना था आज तुमसे
क्यों समझते हो तुम ऐसा?
- अच्युतम यादव 'अबतर'
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