नाराज़गी किसी से जता कर नहीं गया
वो अपनी बे-दिली भी दिखा कर नहीं गया

बरसात से डरा हुआ वो तन्हा आदमी
काग़ज़ की कोई कश्ती बना कर नहीं गया

ये कैसे मानूँ मैं कि वो आएगा लौट कर
कोई दिलासा भी तो दिला कर नहीं गया

उस जाने वाले से ये गिला ही रहा कि वो
जाते हुए गले से लगा कर नहीं गया

उसके फ़िराक़ से फ़ज़ा भी ग़मज़दा हुई
तूफ़ाँ भी कोई पत्ता हिला कर नहीं गया

शायद मेरा भी दिल नहीं था एक होने का
वो भी कोई बहाना बना कर नहीं गया

‘अबतर’ थे मेरे पास सितारे कई मगर
मैं आसमान सर पे उठा कर नहीं गया

- अच्युतम यादव 'अबतर'